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क्या अब मर जाऊं मैं? - वीर भद्र पंत
जीवन मेरा माटी का ढेर, कुछ न मिला देर सवेर, चाहा कुछ कर जाऊं मैं, क्या अब मर जाऊं मैं? जीवन में मायूसी का आलम, बस बचा है दुःख और गम, लगता है अब लायक नहीं मैं, क्या अब मर जाऊं मैं? …
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