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क्या अब मर जाऊं मैं? - वीर भद्र पंत हिन्दी

क्या अब मर जाऊं मैं? - वीर भद्र पंत

जीवन मेरा माटी का ढेर, कुछ न मिला देर सवेर, चाहा कुछ कर जाऊं मैं, क्या अब मर जाऊं मैं? जीवन में मायूसी का आलम, बस बचा है दुःख और गम, लगता है अब लायक नहीं मैं, क्या अब मर जाऊं मैं? …

V Vir Bhadra Pant ·
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जी तो हम रहे हैं। - वीर भद्र पंत हिन्दी

जी तो हम रहे हैं। - वीर भद्र पंत

जी तो हम रहे हैं,पर जान नहीं साथ मेरे, सुना है कोई खाली जाता नहीं दर से तेरे। अब तो शायद मर के भी न मिल पाऊं उससे मीट जायेगी उसकी याद भी मौत के साथ मेरे क़त्ल किआ अरमानो का और जिन्द…

V Vir Bhadra Pant ·
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