क्या अब मर जाऊं मैं? - वीर भद्र पंत
जीवन मेरा माटी का ढेर,
कुछ न मिला देर सवेर,
चाहा कुछ कर जाऊं मैं,
क्या अब मर जाऊं मैं?
जीवन में मायूसी का आलम,
बस बचा है दुःख और गम,
लगता है अब लायक नहीं मैं,
क्या अब मर जाऊं मैं?
समय है जैसे आग का गोला,
जलाता है मुझको सबसे अकेला,
लगता है जी सकता नहीं मैं,
क्या अब मर जाऊं मैं?
वो नहीं है तो बस बचा हूँ आधा,
जी लिया हूँ जैसे कुछ ज्यादा,
लगता है अब कुछ कर जाऊं मैं,
क्या अब मर जाऊं मैं?
तेरी जुस्तजू तो बहोत की मैंने,
तू बस सपनों में ही मिला मुझे,
नींद में सो जाऊं हमेशा के लिए मैं,
क्या अब मर जाऊं मैं?
तेरे बगैर यहाँ जैसे कुछ छुट गया है,
तू इस तरह जिंदगी में सामिल हो गया है,
लगता है तेरा अब हो जाऊं मैं,
क्या अब मर जाऊं मैं?
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