इस कदर क्यों तड़पाये मुझको — वीर भद्र पंत
ज़िंदगी मेरी मौत से बदतर,
किसी ने न समझा मुझको,
न चाहा, न दिल में जगह दी,
किसी ने न पूछा मुझको।
दिल पत्थर और ख़ुदा भी पत्थर,
न दिखा, न दिखलाया मुझको,
तू भी तो था ख़ुदा मेरा तो,
क्यों न गले लगाये मुझको?
दिल अर्थी और रूह आग-सी,
क्यों ऐसे तू जलाये मुझको?
दिन बंजर, बस रातों का मंज़र,
बस ऐसे तू तड़पाये मुझको।
ज़िंदगी मेरी मौत से बदतर,
किसी ने न समझा मुझको,
न चाहा, न दिल में जगह दी,
किसी ने न पूछा मुझको।
दिल जलकर ख़ाक है और रूह भी उदास है,
ऐसे न अब सताओ मुझको।
तू ही तो था ख़ुदा मेरा तो,
क्यों न गले लगाये मुझको?
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