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लत तो ज़रूर है मुझे। - वीर भद्र पंत

लत तो ज़रूर है मुझे। - वीर भद्र पंत

लत तो ज़रूर है मुझे,
वो भी बहुत बुरी है मुझे,
चाहे उसके प्यार का कहो
चाहे उसके नफरत का कहो।

शाम हो गई दीवानगी की,
जरुरत है बहोत रौशनी की,
कुछ और है नहीं जलाने को,
ले दे रहा अपना दिल जलाने को।

जा एक बार फिर मै मर गया,
उसने देखा और दिल ठहर गया,
साँसे जैसे रुक सी गई हो मेरी,
जीते जीते एक बार फिर रह गया।

उसके होटों को मैं चख लेता ,
एक बार उसे बाहों में भर लेता,
कास वो आये फिर एक बार,
उसकी तस्वीर आँखों में बसा लेता।

ना उसने कभी कद्र की मेरी,
न मेरी मोहब्बत उसे गवारा हुई,
वो अपने दिल में तो बहोत खुश हैं,
पर मेरी ख़ुशी की उसको परवाह न हुई।

अब जो वो लौट आये हैं,
खुशिओं का संदेसा लाये हैं,
मेरा तो सब लूट गया मानो,
और वो मुझे हँसाने आये हैं।

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