नसीब से खुद को बचाया ऐसे। - वीर भद्र पंत
नसीब से खुद को बचाया ऐसे कि,
न मिल रही थी वो फिर भी पाया उसको,
अब जो वो नहीं है बस रोते हैं और,
सोचते हैं कैसे नसीब रुलाया मुझको।
हंसाते हंसाते ये भूल गए हम,
चाहा था क्या, क्या पा गए हम,
लगता था उस को अब भूल गए हैं,
फिर क्यों मुस्कुराते ही रो दिए हम।
मेरे गुनाहों की सजा क्यों मेरा दिल पाए,
जल रहा हूँ, अगर छुए तो तू भी जल जाए,
तू भी मांग एक दुआ मेरे लिए उस रब से,
कि मर जाऊँ मैं, दिल को आज़ादी मिल जाए।
रोता है दिल पर भीग रही आँखें मेरी,
कौन कहेगा मुझसे वो सारी बातें तेरी,
दिल हैरान है बहुत और मैं परेशान,
मर गया मैं बस चल रही साँसें मेरी।
बहते अश्कों की ये मासूम दुआ है कि
खुदा रहमत बख्शे तुझे खुश रखे
मैं तो खुश हूँ, ये आँखें हैं नादान,
रोना फितरत है इसकी, ये तो है ही बदनाम।
नसीब से खुद को बचाया ऐसे कि,
न मिल रही थी वो फिर भी पाया उसको,
अब जो वो नहीं है बस रोते हैं और,
सोचते हैं कैसे नसीब रुलाया मुझको।
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