काश तू चली आती - वीर भद्र पंत
तू गई तो ऐसा लगा
जैसे जान ही निकल गई,
मौत भी आती नहीं है,
इस नज़र के सामने।
तू नहीं तो ऐसा लगा
जैसे कब्र में भी कैद हूँ,
खुदा भी आता नहीं है,
और तू भी आती नहीं।
बार बार यूँ मारती हो,
क्यों मुझे तड़पाती हो,
अपने होटों से पिला के जहर,
क्यों नहीं सुला देती मुझे।
तुझसे लिपट के रो लूँ,
तुझे बाँहों में भर लूँ,
अपने हाथों से कत्लेआम,
क्यों नहीं कर देती मुझे।
इतना याद आती हो,
सीना छल्ली कर जाती हो,
मेरे हर एक आंसुओं का हिसाब,
क्यों नहीं देती मुझे।
काश मेरी मौत आती,
या कहीं से तू चली आती,
तेरी हँसी तो जैसे की,
मार ही देती है मुझे।
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