ऐ खुदा- दे जवाब मेरे सवाल का - वीर भद्र पंत
ऐ खुदा-दे जवाब मेरे सवाल का,
मेरी जिंदगी इतनी ख़ामोश और मायूस क्यों है?
मेरे नयन इतने जले और भीगे क्यों हैं?
मेरी धड़कन इतने सहमे इतने धीमे क्यों हैं?
ऐ खुदा-दे जवाब मेरे सवाल का।
आँखों की नादानी और दिल की बेइमानी इस तरह मुझपे सजा क्यों हैं?
खामोश धड़कन और ख़ामोश, तू इसकी वज़ह क्यों है?
मेरी मोहब्बत और तेरी बेवफ़ाई, इस तरह मुझपे क़र्ज़ क्यों है?
ऐ खुदा-दे जवाब मेरे सवाल का।
उसकी जिंदगी मेरी जिंदगी से प्यारी क्यों है?
उसकी आवाज़ इस क़दर मेरे ज़हन पर हावी क्यों है?
अपनी तबाही अपने ही हाथों से , मैंने मांगी क्यों है?
ऐ खुदा-दे जवाब मेरे सवाल का।
उसका एहसास, उसकी यादें इस तरह मुझसे नाराज़ क्यों है?
मेरी हँसी, मेरी खुसी इस तरह मुझसे खफा क्यों है?
उसकी मुस्कुराहट और मेरी मौत इस तरह मुझको अज़ीज़ क्यों है?
ऐ खुदा- दे जवाब मेरे सवाल का।
ऐ खुदा-दे जवाब मेरे सवाल का।
ऐ खुदा-दे जवाब मेरे सवाल का।
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