कलम उम्मीद ग़ज़ल ख़ुशी। - वीर भद्र पंत
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
आय दिन हैं बहार के नाच लूँ आज मैं
इस तरह नगमे वफ़ा के गाता चला गया।
दिल में यूँ तेरी याद लिए हस्ता हूँ कुछ ऐसे
अपने वो लफ़ज़ ए ग़ज़ल उतारू कुछ ऐसे।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
यु बचा है प्यार कुछ सहमा सा इस दिल में
गा कर राग ए वफ़ा उन्हें यूँ जगाता चला गया।
कुछ लकीर उस पत्थर पर अब खीचूँ मैं कैसे
बिखरे उस दिल के टुकड़े को अब समेटूँ मैं कैसे।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
तू मिलेगी फिर कभी मुझे उस रस्ते जिग़र में
दिल को एक उम्मीद दिए चलता चला गया।
एक दिन बिछड़ने का डर निकालूँ मैं कैसे
इस तरह से जुदाई ए गम मिटाऊं अब कैसे।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
तू हँसे यूँ लगे नशा ए खुसी छा जाए मुझपर
उस नशे में हर गम को अब भूलता चला गया।
फिर क्या इस नशे की लत छुड़ाऊं अब कैसे
इस कटीले रास्ते से घर को जाऊं मैं कैसे।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
सुना खुदा दिखता है मंज़िल ए इश्क़ का रास्ता
खुद को उस रास्ते के काबिल बनाता चला गया।
खुद को उसके इश्क़ में डुबोया है कुछ ऐसे
खुद को क्या दिल को भी भिगोया है ऐसे।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
अब तो यूँ कोई ग़ज़ल याद आता नहीं मुझको
शायरी में भी अब तेरा ज़िक्र करता चला गया।
आ जाये नाम ए इश्क़ को भुलाऊँअब मैं कैसे
तुझको छोड़ कर यूँ दूर होजाऊँ अब मैं कैसे।
तेरे हर्फ़ ए लबों को कतरा कतरा पिता चला गया
तेरे हुस्न के बारिश में बेख़ौफ़ नहाता चला गया।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
जिंदगी के अफ़साने कुछ ऐसे लिखता गया
कलम उम्मीद ग़ज़ल खुसी गाता चला गया।
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