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तुझको ना भुला पाये- वीर भद्र पंत

तुझको ना भुला पाये- वीर भद्र पंत

तुझको बहोत चाहा पर तुझको न पाया हमने,
तेरी बेरुखी को इस कदर सुर में पिरोया हमने,
की रस्म समझ कर इस जुदाई को भी निभाया हमने।

दिल के दरिया में आग लगी और बरस रही हैं आँखे मेरी,
तेरे इश्क़ में तड़प के इतना रोयीं आँखे मेरी,
की समंदर को भी रो के रुस्वा कर दिया हमने।

अब तो तेरी सूरत भी हमे याद आती नहीं,
ये ज़हर जिंदगी का पीते रहे मरते रहे,
जा मर कर तुझे आखिर भुला दिया हमने।

अब जो बैठे हैं तो ये अफ़सोस करते हैं,
रोते हैं और खुद ही से शिकवा करते हैं,
इस तरह रोने के सिवा और न कुछ किआ हमने।

तुझे पाने की दुआ मैंने मांगी रब से,
भूल गए खुद को और दूर रखा सब से,
बस तेरे इबादत के सिवा और न कुछ किआ हमने।

दिल तो अब मर गया है खो गई साँसे मेरी,
तुझसे दिल लगाने की ये सजा पाया हमने,
की आंसुओं का भी क़तल कर दिया हमने।

उम्र तमाम गुज़ार डाला पर तुझको न देखा हमने,
तड़पते रह गए पर तुझको न पुकारा हमने,
इस तरह तड़पने के सिवा और न कुछ किआ हमने।

तुझे बहोत चाहा पर तुझको न पाया हमने,
तेरी बेरुखी को इस कदर सुर में पिरोया हमने,
की रस्म समझ कर इस जुदाई को भी निभाया हमने।

इस के आगे और कुछ न बयां कर पाये,
तुझे इतना चाहा की खुद को भी मिटा डाला हमने,
तुझे चाहने के सिवा और न कुछ किआ हमने।

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