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तू दूर खड़ा एक आग — वीर भद्र पंत

तू दूर खड़ा एक आग — वीर भद्र पंत

तू दूर खड़ा एक आग,
जला दे तन-मन, कर दे साफ़।
जला दे तन-मन, कर दे साफ़।

राख की दूँगा मैं ये मिसाल,
लगा ले तन पे, ओ बैताल।

ओ मेरे रूह, आस, विश्वास,
करा दे भव का दरिया पार।

मिला ले अपने में, ओ मेरे नाथ,
करके तेरा ध्यान दिन-रात।

बुला लूँ तुझको अपने पास,
ओ मेरे रूह, आस, विश्वास।

तू दूर खड़ा एक आग,
जला दे, कर दे मन को मेरा साफ़।

करूँ दान-पुण्य का काम,
तेरा बन के छोटा दास।

बना दे मुझको अपना दास,
करा ले पूजा-भक्ति साथ।

तू दूर खड़ा एक आग,
जला दे तन-मन, कर दे साफ़।

कंठ में तेरे गरल का वास,
मेट दे जनम-मरण की प्यास।

जटा से बहती गंगा धार,
शीश पे सोहे चंदा खास।

जपूँ मैं तेरा नाम दिन-रात,
सुन ले मेरे दिल की बात।

चरणों में तेरे मेरा वास,
ओ मेरे रूह, आस, विश्वास।

दिखा दे मुझको अलख प्रकाश,
काट दे मोह-माया के पाश।

ओ ओघड़ दानी, हे महाकाल,
तेरी भृकुटि बदले जग की चाल।

तन पर लिपटा नाग कराल,
कर दे हर विपदा को पार।

तू दूर खड़ा एक आग,
जला दे तन-मन, कर दे साफ़।

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