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तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा — वीर भद्र पंत

तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा  — वीर भद्र पंत

तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा,
कितनी ये जवाँ रात है तन्हा।
किससे करूँ बयाँ जज्बातों को,
लब पर आते ख़यालात हैं तन्हा।

तुम दे गए थे अपनी एक निशानी,
उस मुस्कान की सौग़ात है तन्हा।
है सजी हसीन सितारों की महफ़िल,
चाँद से अपनी मुलाक़ात है तन्हा।

बस गए हो यूँ मेरे लफ़्ज़ों में,
तेरे ज़िक्र बिना हर बात है तन्हा।
ढूँढे तुझको नज़रें गली-गली,
बहते अश्कों की बरसात है तन्हा।

बुलाती है पास तुझे यादें मेरी,
वो मोहब्बत के लम्हात हैं तन्हा।
तूने किए थे जो वादे मुझसे कभी,
उन वादों के लफ़्ज़-ए-ख़यालात हैं तन्हा।

जिस बरसात में तुम मुझको छोड़ आए थे,
एक-एक बूँद बिन वो बरसात है तन्हा।
फिर आ जाता है ज़ेहन में तेरा ज़िक्र कभी,
उस ज़िक्र की हर वारदात है तन्हा।

जाते-जाते जो तूने दिया था वो जवाब मुझे,
उस जवाब में छुपे सवालात हैं तन्हा।
तेरी यादों में जो गुज़री हैं रातें मेरी,
उन रातों में बिखरे जज़्बात हैं तन्हा।

बदल गए वो तो यूँ अचानक,
अब दिल के ये हालात हैं तन्हा।
सुलग रहे हैं जो दिल में मेरे,
वो अनकहे एहसासात हैं तन्हा।

तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा,
कितनी ये जवाँ रात है तन्हा।
किससे करूँ बयाँ जज्बातों को,
लब पर आते ख़यालात हैं तन्हा।

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