पल में गुज़रती ये ज़िंदगी — वीर भद्र पंत
पल में गुज़रती ये ज़िंदगी,
लौ बनकर जलती ये ज़िंदगी।
ख़ामोश हूँ मैं भी, और तू भी,
कुछ भी न कहती ये ज़िंदगी।
पल-पल, हर पल यूँ ही जैसे,
ज़र्रा-ज़र्रा जलता गया,
आज की महफ़िल में हर वो कल
राख बनकर उड़ता गया।
इस नशे में ख़ुद को खोकर,
ज़िंदगी को खोजता रहा कहीं,
अब कमबख़्त होश में आने का,
मन ही नहीं होता कभी।
होता है क्या, देख ऐ ज़िंदगी
तरसती है कितना तू, देख ज़िंदगी
कभी चहकती थी अब मायूस है क्यों?
कभी धूप तो कभी छाँव है ज़िंदगी।
कितनी खामोश है जिंदगी,
कुछ भी न कहती है जिंदगी।
चल रही है मगर थम सी गई है,
जाने किस मोड़ पर ले आई है जिंदगी।
जादुई आँखें थीं उसकी
क्या मदहोश नशा था
न पीते तो मर जाते
पीकर ही मर जा, ए - ज़िंदगी।
तेरी जगह तो है दिल में
अब वो बिल्कुल खाली-सा है
उसमें बस तेरी ही आवाज़
हर तरफ़ गूँजती है ज़िंदगी।
हर साँस में कोई अधूरी कहानी है,
हर ख़ामोशी में तेरी निशानी है।
मैं जी रहा हूँ या बस गुज़र रहा हूँ,
हर पल में गुज़रती है ज़िंदगी...
पल पल गुज़रती ये ज़िंदगी,
लौ बनकर जलती ये ज़िंदगी।
ख़ामोश हूँ मैं भी, और तू भी,
कुछ भी न कहती ये ज़िंदगी।
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