फिर उसकी याद आई — वीर भद्र पंत
फिर उसकी याद आई और कर गई तन्हा,
जी रहा था जो ज़िंदगी, वो हो गई फ़ना।
अब तो जीते जी बस है मौत का मंज़र,
काश वो उतार देती इस सीने में ख़ंजर।
तकलीफ़ होती मुझे, पर मैं सह लेता,
शायद मरकर कोई और ज़िंदगी जी लेता।
वो सोचते होंगे कि जुदाई में हम ख़ुश हैं,
और उनके प्यार की ख़ातिर सरफ़रोश हम हैं।
मरते भी नहीं और जीते भी नहीं इस तरह,
उनकी नफ़रत की ज़ंजीर में बस क़ैद हम हैं।
बातें करता हूँ अकेले में, पर उन्हें कुछ कह नहीं सकता,
और वो हैं कि सिवाय ग़म के हमें कुछ दे नहीं सकता।
ऐ ख़ुदा, कहाँ है तू? अब तो कर दे आबाद मुझे,
मैं तो मजबूर हूँ, ख़ुद से मर भी नहीं सकता।
वो क़ातिल है मेरा, पर है मुझे सबसे अज़ीज़,
चाहता हूँ, पर कभी जा नहीं सकता उसकी दहलीज़।
अगर कोई दाग़ लग जाए उसके दामन पर कहीं,
बिन कहे मर जाऊँगा मैं, हूँ ऐसा दिल का मरीज़।
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