मेरी मौत मुक़मल कर दे- वीर भद्र पंत
ऐ मालिक मेरी मौत मुझे मुक़मल कर दे,
कम से कम एक बार मुझे फ़िर नयी मौत दे दे,
जला मुझे, काट मुझे, फ़िर से वो तड़प दे दे,
ऐ मालिक मेरी मौत को मेरे मुक़मल कर दे।
दिन अब गुज़रता है जैसे दिल को अँधेरा कर दे,
ये उधार की जिंदगी मेरे नाम दस्तख़त कर दे,
मेरे सुनसान इस जिंदगी को थोडा अस्तबल कर दे,
ऐ मालिक मेरे मौत को मेरे मुक़मल कर दे।
जो सदियों से खोज रहा था वो जिंदगी दे दे,
पल पल ना मार मुझे तू, हाथों में ज़हर दे दे,
तब तक पिऊंगा जब तक वो असर ना दे दे,
ऐ मालिक मेरी मौत मेरे मुक़मल कर दे।
तड़पती रूह की बिज़ली में मुझे थोडा झुलसना है,
मरने से पहले एक बार तुझसे ज़रूर मिलना है,
ये मेरे क़दम उस मंज़िल के थोड़ा काबिल कर दे,
ऐ मालिक मेरी मौत को मेरे मुक़मल कर दे।
कुछ मेरे अपने छोड़ आये थे मुझे अकेला,
बार बार हर बार तलाशा पर वहाँ कोई न मिला,
वो कमी मेरी जिंदगी की पूरी कर दे,
ऐ मालिक मेरी मौत को मेरे मुकमक कर दे।
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