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ये सिगरेट। - वीर भद्र पंत

ये सिगरेट। - वीर भद्र पंत

पल पल जलती, हलक से उतरती,
मीठी मीठी कसक वाली,
खुद को मेरे लिए जलाती,
मेरे हाथ की वो जलती सिगरेट।

बिलकुल उसके एहसास की तरह,
अधजले तड़पते प्यास की तरह,
अपने बचे राख की गर्मी से,
जर जर मुझको पिघलाती सिगरेट।

ले जाती है सपनों के महल में,
तेरी यादों के सुरीले सफ़र में,
जैसे आँचल में तुमने छुपाया था,
चुपके से कफ़न ओढ़ाती सिगरेट।

उड़ते धुंवे मे खोजता तुझको,
कैद कर लेता साँसों में उसको,
तेरी हसीन सरारत की तरह,
यादों की तलब लगाती सिगरेट।

धीरे धीरे रागों में उतरती,
तीखे खंज़र सी दिल को चीरती,
उतर गई हो जैसे तुम दिल में,
मुझको खुद मे मिलाती सिगरेट।

तुझे देखा ताज़ा हो गए ज़खम,
हालात से लड़ता ओढ़ के कफ़न,
वक़्त गुज़ारने मे एक सच्चा हमराह,
हर पल मुझको अपनाती सिगरेट।

जानता हूँ फिर भी जलाता हूँ,
बिखरते धुंए मे तुझको पाता हूँ,
दिल के सागर में रंग मिला कर,
अलग अलग ज़ज़्बात जगाती सिगरेट।

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Comments (1)

R
Ranjan

Good poem. Keep going!

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