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9 poems · page 2

तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा  — वीर भद्र पंत हिन्दी

तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा — वीर भद्र पंत

तेरे बिन मेरे जज़्बात हैं तन्हा, कितनी ये जवाँ रात है तन्हा। किससे करूँ बयाँ जज्बातों को, लब पर आते ख़यालात हैं तन्हा। तुम दे गए थे अपनी एक निशानी, उस मुस्कान की सौग़ात है तन्हा। ह…

V Vir Bhadra Pant ·
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फिर उसकी याद आई — वीर भद्र पंत हिन्दी

फिर उसकी याद आई — वीर भद्र पंत

फिर उसकी याद आई और कर गई तन्हा, जी रहा था जो ज़िंदगी, वो हो गई फ़ना। अब तो जीते जी बस है मौत का मंज़र, काश वो उतार देती इस सीने में ख़ंजर। तकलीफ़ होती मुझे, पर मैं सह लेता, शायद मर…

V Vir Bhadra Pant ·
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इस कदर क्यों तड़पाये मुझको — वीर भद्र पंत हिन्दी

इस कदर क्यों तड़पाये मुझको — वीर भद्र पंत

ज़िंदगी मेरी मौत से बदतर, किसी ने न समझा मुझको, न चाहा, न दिल में जगह दी, किसी ने न पूछा मुझको। दिल पत्थर और ख़ुदा भी पत्थर, न दिखा, न दिखलाया मुझको, तू भी तो था ख़ुदा मेरा तो, क्य…

V Vir Bhadra Pant ·
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तू ही था वो दोस्त हमेशा।- वीर भद्र पंत हिन्दी

तू ही था वो दोस्त हमेशा।- वीर भद्र पंत

तू न था दुश्मन मेरा तो क्यों न मिले पहले कभी? यूँ तो टूटता है ख्याल मेरा, तो क्यों न पहले जगाये कभी?? जिंदगी तेरे साथ का मोहताज़ है, सांसे जिंदगी का मोहताज़ है, साँसे हवाओं का मोहताज़…

V Vir Bhadra Pant ·
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मेरी मौत मुक़मल कर दे- वीर भद्र पंत हिन्दी

मेरी मौत मुक़मल कर दे- वीर भद्र पंत

ऐ मालिक मेरी मौत मुझे मुक़मल कर दे, कम से कम एक बार मुझे फ़िर नयी मौत दे दे, जला मुझे, काट मुझे, फ़िर से वो तड़प दे दे, ऐ मालिक मेरी मौत को मेरे मुक़मल कर दे। दिन अब गुज़रता है जैसे दिल …

V Vir Bhadra Pant ·
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क्या अब मर जाऊं मैं? - वीर भद्र पंत हिन्दी

क्या अब मर जाऊं मैं? - वीर भद्र पंत

जीवन मेरा माटी का ढेर, कुछ न मिला देर सवेर, चाहा कुछ कर जाऊं मैं, क्या अब मर जाऊं मैं? जीवन में मायूसी का आलम, बस बचा है दुःख और गम, लगता है अब लायक नहीं मैं, क्या अब मर जाऊं मैं? …

V Vir Bhadra Pant ·
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जी तो हम रहे हैं। - वीर भद्र पंत हिन्दी

जी तो हम रहे हैं। - वीर भद्र पंत

जी तो हम रहे हैं,पर जान नहीं साथ मेरे, सुना है कोई खाली जाता नहीं दर से तेरे। अब तो शायद मर के भी न मिल पाऊं उससे मीट जायेगी उसकी याद भी मौत के साथ मेरे क़त्ल किआ अरमानो का और जिन्द…

V Vir Bhadra Pant ·
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ये सिगरेट। - वीर भद्र पंत हिन्दी

ये सिगरेट। - वीर भद्र पंत

पल पल जलती, हलक से उतरती, मीठी मीठी कसक वाली, खुद को मेरे लिए जलाती, मेरे हाथ की वो जलती सिगरेट। बिलकुल उसके एहसास की तरह, अधजले तड़पते प्यास की तरह, अपने बचे राख की गर्मी से, जर जर…

V Vir Bhadra Pant ·
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नसीब से खुद को बचाया ऐसे। - वीर भद्र पंत हिन्दी

नसीब से खुद को बचाया ऐसे। - वीर भद्र पंत

नसीब से खुद को बचाया ऐसे कि, न मिल रही थी वो फिर भी पाया उसको, अब जो वो नहीं है बस रोते हैं और, सोचते हैं कैसे नसीब रुलाया मुझको। हंसाते हंसाते ये भूल गए हम, चाहा था क्या, क्या पा …

V Vir Bhadra Pant ·
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